मगर हम भी वो कश्ती हैं किनारा ढूंढ़ लेते हैं
कई आंधी भी देखी है,
कई तूफां भी देखे है,
मगर हम भी वो कश्ती हैं किनारा ढूंढ़ लेते हैं।
वक्त भी आजमाता है,
जिंदगी खेलती हमसे,
मगर हम वो नहीं हैं जो, यूंही हार मानजाते हैं।
लड़ेगें हम भी जब तक ये,
आख़री सांस है अपनी,
हम भी वो है जो हर हाल में, फतेह मैदान करते हैं।
गर गमों की भी कोई आंधी जो आजाए,
हमे क्या खोफ़ है उनसे,
हमने कई तूफां भी झेले हैं।
जो खोना था खो चुके हैं,
बचा ही क्या है अब हमपर,
हमे क्या फ़िक्र उसकी है, जो खोने से डरेंगे हम।
खड़े है भीड़ में हम तो,
मगर फिर भी अकेले हैं,
हमे समझा नहीं कोई, यंहा समझाइश के मेले हैं।
कोई क्या हमको तोड़ेगा,
है इतना दम किसी में क्या,
समेटे हैं हजारों गम, मगर मुस्कुरा ही देते हैं।
Shikha Sharma