Monday, June 28, 2021

विरह वेदना

 विरह वेदना

मांग लेते गर जान भी दे देते,
जीते जी मारना क्या जरूरी था।

तेरे संग हर गम हम सेह लेते,
दुर जाना क्या इतना जरूरी था।

मिलना ना था किस्मत में अपनी,
फिर मिल के बीछडना क्या जरूरी था।

खुश थे हम अपनी जिंदगानी में,
क्या तेरा आना भी जरूरी था।

गुजरे हैं हम भी कई मोड़ से,
क्या इस मोड़ से गुजरना भी जरूरी था।

मेरी  नीदों में ऐसे सपने ना थे,
क्या तेरे खाबों का आना भी जरूरी था।

देखे हैं यूं तो कई गम हमने,
क्या इस गम को पाना भी जरूरी था।

याद चाहे ना करते हमें तुम मगर
क्या इस तरह भुल जाना जरूरी था।

अब ये तो बताओ में जाऊं कहां,
हमसफ़र तुमको समझना क्या जरूरी था।

लब पे मेरे हंसी रहती थी सदा,
यूं रुलाना भी क्या जरूरी था।

दर्द को हम अपने केसे छुपाएं,
इन आशुओं को छुपाना भी तो जरूरी था।

है मुक्कदर से मेरी सिकायत इतनी,
जिसको चाहा उसको खोना भी क्या जरूरी था।

क्या से क्या होगए  हम टूटकर प्यार में,
शायद यूं टूटना भी जरूरी था।


प्रेम पर कविता लिखने की ये मेरी छोटी सी
कोशिश है आशा करती हूं जिस तरह आपने मेरी बाकी कविताओं को अपना स्नेह और आशीर्वाद दिया है उसी तरह मेरी इस कविता को भी आपका स्नेह और आशीर्वाद प्राप्त होगा धन्यवाद

Shikha Sharma


Friday, June 25, 2021

कलयुग में रिश्तों का खेल (व्यंग काव्य)


 कलयुग में रिश्तों का खेल (व्यंग काव्य)

देखो कलयुग का ये,
खेल निराला है,
खोखले हैं रिश्ते नाते,
धन का बोलबाला है।

धनवान को तो सब, 
पूजते यहां पर हैं,
गरीब इस दुनिया में,
बिल्कुल अकेला है।

मुख देख देख ये,
रिश्ता निभाते हैं,
पलड़ा है भारी जंहा,
वहीं झुक जाते हैं।

मतलब पड़ने पर,
दौड़े दौड़े आते हैं,
गधे को भी अपना,
बाप बनाते हैं।

खुशी देखी जाए ना,
इन से औरों की,
मुंह पे मीठे,
पीठ पीछे छुरियां चलाते हैं।

बनते हैं दानवीर,
बाहर ये मगर,
अपनों को तो ये,
सदा ठुकराते हैं।

माटी का तन ये,
माटी में मिल जाना है,
गुरूर किस बात का,
कल किसी और का भी आना है।
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Shikha Sharma

मन की उदासी

 मन की उदासी

ऐ मन ये बता दे तु,
क्यों उलझा उलझा रहता है।

क्यों उदास है इतना तु,
क्यों बात बात पर रोता है।

क्यों करता है इस जग की चिंता,
क्यों नहीं तु अपने में ही रहता है।

कोई बात तुझे सताती है,
किस बात में उलझा रहता है।

क्यों समेटे है इतने दर्द खुद में,
क्यों किसी से कुछ नहीं कहता है।

उलझन पर उलझन बढ़ती जाती है,
क्यों इसको तु ना सुलझाता है।

खुद ही ना जाने कितने सपने बुनता है,
खुद ही टूटे सपनों पर रोता है।

किस राह पर तुझको जाना है,
किस राह पर तु जाता है।

उदासी से क्यों तेरा गहरा नाता है,
क्यों खुशियों से तु दुर रहता है।

Shikha Sharma

Thursday, June 24, 2021

ऐ वक्त मुझे ले चल फिर से उसी बचपन में

 ऐ वक्त मुझे ले चल फिर से उसी बचपन में

ऐ वक्त मुझे ले चल,
फिर से उसी बचपन में।

भुल जाऊं मैं सारे गम,
फिर से खेलुं उस मिट्टी में।

घुमु फिर से बेफिक्र कहीं,
आजाद हो जाऊं हर फ़िक्र से मै।

फिर से करूं वही शरारतें,
फिर से मां की डांट में खाऊं।

फिर से मांगु दादी से पैसे,
फिर से मिल जाए नानी का प्यार

पापा की पीठ पर बैठकर,
फिर से बनाऊ उनको घोड़ा।

फिर से छुप जाऊं मां के आंचल में,
फिर वही सुकुं में पाऊं।

फिर से खेलुं खेल खिलौने,
फिर खेलुं नदी पहाड़।

ना फ़िक्र हो मुझको कल की,
लौट जाऊं फिर उस बचपन में।

Shikha Sharma

असुरक्षित नारी

 असुरक्षित नारी

इस हैवानों की बस्ती में,
नहीं सुरक्षित नारी है।

डर में जीती घुटती मरती,
पल पल भयभीत अब नारी है।

भयभीत है मात पिता बेटी के,
डरते है बेटी के बाहर जाने में।

वस्त्रों पर सब दोष लगाते,
रोक लगाते ना हैवानों पर।

बेटी को ही सब संस्कार सिखाते,
संस्कार सिखाते ना उन हैवानों को।

लुटती लाज द्रौपदी की अब,
वासुदेव ना आते बचाने को।

चौराहों पर खड़े हुए उन बेशर्मों को,
थोड़ी तो अब शर्म सिखाओ।

देकर संस्कार अपने बेटों को,
समाज से ये गंदगी मिटाओ।
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Shikha Sharma

Wednesday, June 23, 2021

जय शारदे जय जय शारदे(सरस्वती वंदना)

 जय शारदे जय जय शारदे(सरस्वती वंदना)

है शत् शत् नमन,
चरणों में तेरे,
जय शारदे जय जय शारदे।

मुझको कला का,
 तु वरदान दे,
जय शारदे जय जय शारदे।

मेरे शब्दों को,
अपना आशीष दे,
जय शारदे जय जय शारदे।

तेरे चरणों में,
रहे शीश मेरा ये,
जय शारदे जय जय शारदे।

गाऊं तेरे गुण,
रहे आशीष तेरा,
जय शारदे जय जय शारदे।

करूं वंदना मै,
तेरी उम्र भर,
जय शारदे जय जय शारदे।

है तुझको समर्पित,
ये गीत मेरा,
जय शारदे जय जय शारदे

Shikha Sharma


Friday, June 18, 2021

कलम

   कलम

ये कलम ही मेरी ताकत है,
मै जग में ऊंचा नाम करूं,
इसके बल पर मै अपने,
सारे सपने साकार करूं।

ना तीरों से ना तलवारों से,
मैं वार करूं इस कलम की ताकत से,
नहीं हुं मोहताज किसी के एहसानो की,
मैं अपनी किस्मत आप लिखुं।

ना डरुं कभी आंधी तूफानों से,
मै लड़ जाऊं तकदीरों से,
ना किसी में इतनी ताकत है,
जो टकरा जाए इन हौसलों की उड़ानों से।

ये कलम ही मेरा साथी है,
हर वक्त मेरा जो साथ निभाए,
मेरी ताकत बनकर ये,
दुनिया में मेरी पहचान बनाए।

Shikha Sharma



ये तिरंगा मेरी जान है

 ये तिरंगा मेरी जान है

ये तिरंगा मेरी जान है,
मेरी सांसों की पहचान है,
ये रहे सदा लहराता युं,
इस पे मेरी ये जान कुर्बान है।

हर फर्ज़ से पहले फर्ज़ मेरा, 
इस देश के नाम ही होता है,
अपनी जान देकर भी मुझको,
इसका कर्ज चुकाना है।

मात पिता से भी पहले,
इस धरती का में सम्मान करूं,
मिट जाऊं खुद में लेकिन,
इस देश का ऊंचा नाम करूं।

सरहद पर मरने वाले,
उन वीरों की सदा शान रहे,
जो बाहा लहु उनका सरहद पर,
उसका भी कर्ज याद रहे।

उस लहु का कतरा कतरा,
ना जाए ज़ाया याद रखो,
इस देश की खातिर वतन वालो,
तुम अपना फर्ज़ याद रखो।

Shikha Sharma

Thursday, June 17, 2021

मांगते दहेज भारी हैं

 मांगते दहेज भारी हैं

बेटा बेटा करते हैं ये,
ये दहेज के लोभी हैं,
बेटे के नाम की पहन के माला,
मांगते दहेज भारी हैं।

इनको कोई शर्म नहीं,
बेशर्मों में है नाम शुमार,
बोली लगा कर खुद की ही,
दुजी बेटी लेजाते हैं।

बेचा बेटा खुद का ही,
फिर बहू को क्यों लेजाते हैं,
अपनी मांगो पर ना जाने,
ये क्यों इतना इतराते हैं।

लाचार हैं शायद ये भी बहुत,
आदत भिखारियों वाली है,
खुद से ना जाए कमाया,
इसलिए औरों का धन ये खाते हैं।

अपने जीवन भर की कमाई,
बेटी का बाप लुटाता है,
देकर अपने दिल का टुकड़ा,
औरों का घर वो महकाता है।

Shikha Sharma
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उस शिखर तक भी में जाऊंगी

 उस शिखर तक भी में जाऊंगी

मत बांधो मुझको संसार की रितों में,
मै हुं पंछी आजाद मुझे उड़ने दो इस अंबर में।

ना करो कोशिश मुझे बदलने की,
मुझे रहने दो अपने ही अंदाजो में।

मैं खुद को आखिर क्यों बदलूं,
मैं जैसी हुं बस अच्छी हुं।

है आदत मुझको मुस्कुराने की,
मुझ से मुस्कान ये मत छीनो।

है सफर ये मेरा लम्बा पर,
मंजिल भी एक दिन पाऊंगी।

है शिखा का ये वादा एक दिन,
उस शिखर तक भी मै जाऊंगी,
उस शिखर तक भी मै जाऊंगी,।
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Shikha Sharma

Sunday, June 13, 2021

कल कहते थे मेरी बिटिया मुझे आज पराई कहते हो

 कल कहते थे मेरी बिटिया मुझे आज पराई कहते हो

कल कहते थे मेरी बिटिया मुझे आज पराई कहते हो,
क्या जो संसार बेटी को बोझ कहे, बोलो बाबा क्या ये वो सच कहता है।

इतनी भी बोलो क्या जल्दी है, मुझे खुद से दुर क्यों करते हो,
में बिटिया तुम्हारी अपनी हुं, मुझे गेरों के हवाले क्यों करते हो।

ना छीनो मुझसे इतने जल्दी तुम, ममता का वो प्यारा आंचल,
मुझको खुद से दुर कहीं ऐसे ना भेजो ओ बाबुल।

में तेरे जीवन भर की कमाई हुं, क्यों औरों पे मुझे लुटाते हो,
बोलो बाबा मुझको तुम क्यों दुर देश पहुंचाते हो।

जो तुमने मुझको दी आजादी, कोई और मुझे दे पाएगा,
प्यार तुम्हारे जैसा मां बाबा क्या कोई और कर पाएगा।

जब भुख लगेगी मुझको तो अपने हाथों से मां जैसे,
कोन मुझे खिलाएगा, लाड़ तुम्हारे जैसा मां बाबा क्या कोई मुझे कर पाएगा।

जब हो जाऊंगी उदास कभी तो कोन मेरा मन बहलाएगा,
और जब हो जाऊं बीमार कभी कोन रात भर साथ में मेरे जागेगा।

मेरी शरारतों से मां बाबा, मुस्कुराते तुम्हारे चेहरे हैं,
जो तुम भेजोगे दुर मुझे मेरा बचपन खो जाएगा।

कहने को में बड़ी हुं लेकिन, कहीं बचपन सा बाकी है,
बोलो बाबा मुझको क्या कोई ऐसे ही अपनाएगा ।

Shikha Sharma


Wednesday, June 9, 2021

मां में तेरी परछाई हुं

मां में तेरी परछाई हुं

सबसे प्यारा रिश्ता इस जग में मां तेरा और मेरा है,
में तेरी लाडो रानी हुं, तु मेरी पहली सहेली है।

जो चोट लगे मुझको तो दर्द तुझे भी होता है,
जब टूटे दिल मेरा तो तकलीफ तुझे भी होती है।

तुझसे दिल का हाल कहूं, मां तुझको सब बतलाती हुं,
मेरे जीवन की तो जैसे तु कोई सीक्रेट डायरी है।

समझे ना मुझको  ये दुनिया वाले, पर तु तो मुझे समझती है,
प्यार मुझे तु इस दुनिया में सबसे ज्यादा करती है।

बस जो तेरा चलता तो उस रब से भी लड़ जाती तु,
मेरी खुशियों की खातिर ना जाने क्या कर जाती तु।

सबसे प्यारा ये मां बेटी का रिश्ता है,
में तेरे जैसी दिखती हुं,मां में तेरी परछाई हुं।



Shikha Sharma


Tuesday, June 8, 2021

आधुनिक युग में आकर प्रेम भी आधुनिक हो रहा है (हास्य कविता)

 आधुनिक युग में आकर प्रेम भी आधुनिक हो रहा है।

आधुनिक युग में आकर प्रेम भी आधुनिक हो रहा है,
सोशल मीडिया पर अब तो निब्बा और निब्बी का ट्रेंड चल रहा है।

कोन है लड़का कोन है लड़की ये भी अब जाने ना कोई,
फिर भी रात रात भर चैटिंग का ये खेल चल रहा है।

वॉट्सएप फेसबुक इंस्टाग्राम पर हर कोई ढूंढता सोलमेट है,
बिन देखे बिन जाने परखे बातो का ये दौर चल रहा।

ब्रेकअप पैचअप होता बार बार है, स्क्रीनशॉट का सबुत है,
बाबु सोना करते करते भुल गए ये रात में सोना।

उम्र नहीं है प्यार की इनकी, फिर भी प्यार का पाठ पढ़ाते,
सेड स्टेटस लगा लगा के ना जाने कितनो का दिमाग पकाते।

सुन लो एक सीख हमारी,
मात पिता सा इस जग में प्यारा ना कोई,
बचपन का तुम लुत्फ़ उठाओ, खुलके हंसते जीते जाओ।

आधुनिक युग में आकर प्रेम भी आधुनिक हो रहा है।

Shikha Sharma

वो जोगी है तेरे मन की ना समझेगा वो

 वो जोगी है तेरे मन की ना समझेगा वो

क्यों गौरा तप की अग्नि में,
जलती हो तुम,
वो जोगी है तेरे मन की ना समझेगा वो।

क्यों तुने ऐसा दीप जलाया,
क्यों मन में ऐसी आस जगायी,
वो जोगी है तेरे मन की ना समझेगा वो।

वो पीता भंग का प्याला है,
और ओढ़ता मृग की छाला है,
वो जोगी है तेरे मन की ना समझेगा वो।

वो तो रहता अपनी धुन में,
तु क्यों जलती उसके तप में,
वो जोगी है तेरे मन की ना समझेगा वो।

तु रूप रंग की रानी है,
वो श्मशान में बसता है,
वो जोगी है तेरे मन की ना समझेगा वो।

तु प्यारी सी सुकुमारी है,
वो बूढ़ा सा लगता है,
वो जोगी है तेरे मन की ना समझेगा वो।

घोर कठोर तप करती हो,
खुद को यूं जलाती हो तुम,
वो जोगी है तेरे मन की ना समझेगा वो।

कई राजा और राजकुमार,
तुमको पाना चाहते हैं,
फिर भी ना जाने क्यों तुम,
उस जोगी पर मरती हो,
वो जोगी है तेरे मन की ना समझेगा वो।

जोगी कहता संसार जिसे वो,
मेरे मन का स्वामी है,
वो जोगी है मेरे मन की एक दिन तो समझेगा वो।

मन में मेरे महादेव बसा है,
देवों का वो देव कहाए,
वो जोगी है मेरे मन की एक दिन तो समझेगा वो।

तप में चाहे मिट में जाऊं,
पाऊं तो महादेव को पाऊं,
वो जोगी है मेरे मन की एक दिन तो समझेगा वो।

वो जोगी श्मशान में बसने वाला,
में तो उसकी जोगन हुं,
वो जोगी है मेरे मन की एक दिन तो समझेगा वो।

त्याग समर्पण प्रेम  मेरा,
सब उसके ही कारण है,
वो जोगी है मेरे मन की एक दिन तो समझेगा वो।

जनम जनम का साथ जुड़ा है,
हृदय ये मेरा कहता है,
वो जोगी है मेरे मन की एक दिन तो समझेगा वो।

मै अधुरी उनके बिन हुं,
वो मेरे शिव हैं मै उनकी शक्ति हुं,
वो जोगी है मेरे मन की एक दिन तो समझेगा वो।

Shikha Sharma

सरहद के वीर

सरहद के वीर  अगर सरहद पे तुम हो तो,  यहां महफ़ूज़ हम सब हैं।  ना दहशत है कोई दिल में,  ना कोई खौफ़ है मन में।  हमारा ताज है तुमसे, वतन की शा...