विरह वेदना
मांग लेते गर जान भी दे देते,
जीते जी मारना क्या जरूरी था।
तेरे संग हर गम हम सेह लेते,
दुर जाना क्या इतना जरूरी था।
मिलना ना था किस्मत में अपनी,
फिर मिल के बीछडना क्या जरूरी था।
खुश थे हम अपनी जिंदगानी में,
क्या तेरा आना भी जरूरी था।
गुजरे हैं हम भी कई मोड़ से,
क्या इस मोड़ से गुजरना भी जरूरी था।
मेरी नीदों में ऐसे सपने ना थे,
क्या तेरे खाबों का आना भी जरूरी था।
देखे हैं यूं तो कई गम हमने,
क्या इस गम को पाना भी जरूरी था।
याद चाहे ना करते हमें तुम मगर
क्या इस तरह भुल जाना जरूरी था।
अब ये तो बताओ में जाऊं कहां,
हमसफ़र तुमको समझना क्या जरूरी था।
लब पे मेरे हंसी रहती थी सदा,
यूं रुलाना भी क्या जरूरी था।
दर्द को हम अपने केसे छुपाएं,
इन आशुओं को छुपाना भी तो जरूरी था।
है मुक्कदर से मेरी सिकायत इतनी,
जिसको चाहा उसको खोना भी क्या जरूरी था।
क्या से क्या होगए हम टूटकर प्यार में,
शायद यूं टूटना भी जरूरी था।
प्रेम पर कविता लिखने की ये मेरी छोटी सी
कोशिश है आशा करती हूं जिस तरह आपने मेरी बाकी कविताओं को अपना स्नेह और आशीर्वाद दिया है उसी तरह मेरी इस कविता को भी आपका स्नेह और आशीर्वाद प्राप्त होगा धन्यवाद
Shikha Sharma