Sunday, August 29, 2021

कृष्ण जन्मोत्सव गीत

कृष्ण जन्मोत्सव गीत

हो काली काली छाई रे,
घटा अंबर पर,
बरसे हैं देखो मेघ गगन से,
झूमे है हरियाली।

हो काली काली छाई  रे,
घटा अंबर पर।

भादों की वो पावन रूत है,
कृष्ण पक्ष की तिथि अष्टमी,
जन्मे हैं कृष्ण कन्हाई।

हो काली काली छाई रे,
घटा अंबर पर।

टूट गई है वेडी सारी,
मूर्छित भय हैं द्वार पाल सब,
खुल गए सारे ताले।

हो काली काली छाई रेे,
घटा अंबर पर।

माया पति की माया देखो,
कैसे कैसे खेल रचाए,
जगत का पलानहारा।

हो काली काली छाई रे,
घटा अंबर पर।

वसुदेव चले हैं शीश पे लेकर,
मयापति के रूप को लेकर,
माया गुण गोपाला।

हो काली काली छाई रे,
घटा अंबर पर।

देखो यमुना व्याकुल होती,
स्वामी के में चरण पखारूं,
हट ये कैसी ठानी।

हो काली काली छाई रे,
घटा अंबर पर।

यमुना की हट देख कन्हैया,
झुकता है देखो जग का खिबैया,
होले चरण बढ़ाए।

हो काली काली छाई रे,
घटा अंबर पर।

भीगत देखे जो श्री हरी को,
शेषनाग ने दी है छईया,
गोकुल कृष्ण पधारे।

हो काली काली छाई रे,
घटा अंबर पर।

यशोदा जायो है नंदलाला,
गोकुल में है आंनद छाया,
आयो है गोपाला।

हो काली काली छाई रे,
घटा अंबर पर।

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Shikha Sharma




Saturday, August 21, 2021

राखी पर लड़कों का डर ( हास्य कविता )

राखी पर लड़कों का डर

तलवार से नहीं और,
ना ही किसी तोप से,
लड़के तो डरते है,
राखी के त्यौहार से।

किसी बिल में जाके,
ऐसे छुप जाते हैं,
कहीं कोई बाला,
इन्हें राखी ना बांध दे।

बंध जाएगी जो राखी,
इनकी कलाई पे,
मनसूबों पे सारे,
पानी फिर जाएगा।

राखी से जाने क्यों,
ऐसे डरते हैं ये,
जैसे कोई इनको,
सुली पे चड़ाता हो।

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Shikha Sharma

Monday, August 16, 2021

श्रीमती जी की शॉपिंग(हास्य कविता)

        श्रीमती जी की शॉपिंग 

आते देख त्यौहार,
पति देव डरते हैं,
कहीं इस बार,
सारी जेब को ना झाड़ दे।

पत्नी की फरमाइश,
बड़ती ही जा रही,
एक नहीं दो नहीं,
चार साड़ी चाहिए।

चार को जो हां की,
पति देव ने तो अब,
पत्नी को सारी,
दुकान अब चाहिए।

साड़ी पे ही कैसे,
रुक जाए नारी अब,
इनको तो किट,
मेकअप की भी चाहिए।

कर कर शॉपिंग,
मै तो थक जाऊंगी,
यहीं से खाना अब,
पैक करवाइए।

छोटू को तो साथ लाई,
छुटकी को छोड़ आयी,
इसको तो अब,
लॉलीपॉप ही दिलाइए।

मृगनयनी के नैन,
जब घूरते हैं तो,
आके पत्नी की,
सेवा में लगजाइए।

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Shikha Sharma



Saturday, August 14, 2021

वतन से इश्क़

                          वतन से इश्क़

क्या होता इश्क़ ये पुछो,
ज़रा तुम उस दिवाने से,
वतन मेहबुब जिसका है,
लिए वो जां हथेली पे।

वो अपनी बूढ़ी मां को भी,
गांव में छोड़कर आया,
बांधकर वो कफ़न सर पर,
सरहद पे बैठा है।

लहू बहता है उसका तो,
ये धरती भी तो रोती है,
लगे जब चोट बच्चे को,
तो जैसे मां कोई रोए।

क्या होता इश्क़ में मरना,
ज़रा उससे ये तुम सीखो,
वतन के वास्ते ही तो,
वो अपनी जान देता है।

सभी वादे तोड़कर वो,
बस एक वादा निभाता है,
वतन के नाम कर जीवन,
वतन पर मिट वो जाता है।

वो अपनी जान देता है,
कोई चाहत नहीं रखता,
वो देश से अपने,
सच्चा प्रेम करता है।

मेरी ये कविता देश पर
मर मिटने वाले उन वीर 
जवानों के नाम आप सभी को
स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
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जय हिन्द जय भारत
Shikha Sharma

Friday, August 6, 2021

मेरी नींदों से होके गुज़रता है तु

 मेरी नींदों से होके गुज़रता है

मेरी नींदों से होकर गुज़रता है तु,
आजकल मेरे ख्वाबों में बसता है तु,
कुछ कहें ना कहें मेरे लब ये मगर,
मेरी धड़कन में तो बस तेरा नाम है।

कुछ असर मुझपे तेरा यूं  होने लगा,
कोई जादू सा मन पर यूं छाने लगा,
हुं कहीं मै कहीं है मेरा मन ये क्यों,
जैसे मै बावरी आजकल होगई।

मै लहर कोई चंचल किनारा है तु,
मेरे जीवन का बस एक सहारा है तु,
मै बहुं तुझसे होकर और थमु तुझपे ही,
मेरे इस सफर की वो मंजिल है तु।

खोई खोई रहूं मैं तेरे ख्वाब में,
होश खुद का नहीं आजकल है मुझे,
मै संवरने लगी और निखरने लगी,
जो मै कल तक ना थी आज होने लगी।

Inspired by Ankita Singh mam
तर्ज़ मोन ने जो कहा मोन सुन ले अगर

Shikha Sharma

सरहद के वीर

सरहद के वीर  अगर सरहद पे तुम हो तो,  यहां महफ़ूज़ हम सब हैं।  ना दहशत है कोई दिल में,  ना कोई खौफ़ है मन में।  हमारा ताज है तुमसे, वतन की शा...