महलों में क्यों व्याही जाएं,
आखिर ये बेटियाँ,
दौलत के तराजू में क्यों,
तौली जाती बेटियाँ।
जब बेटी थी तुम्हारी बाबा,
उफ भी ना करती थी ये,
एक फ्राक भी लाए ग़र तुम,
इतराती फिरती थी ये।
दौलत ना थी पास तुम्हारे,
पर बेटी शहजादी थी,
पढ़ लेती थी हर बात को बाबा,
देख के तेरी आँखों में।
महलों में व्याही हुं जब से,
दिल ये मेरा रोता है,
मेरी आँखों में अब हरपल,
एक दरिया सा बेहता है।
माना बाबा तुम्हें तजुर्बा,
जादा होगा जीवन का,
क्या अच्छा है क्या बुरा है,
शायद तुम ही जानो ये।
पर डर लगता है मुझको बाबा,
ऐसे महलों बालों से,
पत्थर की दीवारें हैं और,
पत्थर दिल इंसान वहां।
रूह भी कापें अब तो मेरी,
सुनकर एसी बातों को,
माना मेरी उम्र नहीं है,
मैं तुमसे कुछ भी बोलूं।
पर देख ज़माना डर लगता है,
मुझको अब इन महलों से,
ऐसा ना हो जाए बाबा,
व्याहो मुझको लंका में तुम।
कल किसी महलों के कोने में,
बिटिया तेरी भी सिसके,
कहना पाऊँगी किसी से,
घुटती रह जाऊँगी मैं।
कल को कहने को बाबा सब लोग कहेंगे भाग्य ये मेरा,
तुमने क्या समझा ना मुझको,
खुश हुं रूखी सूखी में,
जो प्यार मिले ग़र थोड़ा सा।
जैसे मैने समझा तुमको,
मुझको भी तो समझे कोई,
दौलत से हर चीज़ मैं बाबा खरीद तो लूँगी दुनिया की,
प्यार किसी का मोल कहो मैं कैसे ले लूँ ओ बाबा।
यह कविता आज के उन हालातों को दर्शाती है
जिनमे बेटियों को बड़े घरों में व्याह तो दिया जाता है यह
सोचकर के बड़े घर में बेटी खुश रहेगी पर यकीन मानिये मेने अपने आसपास एसी बेटियों के दुख को अनुभव किया है आज जो हालात है उसमे दौलत ने इंसान को इतना अंधा बना दिया है की इंसान इंसान की कद्र करना भूल गया है
मेरा बेटियों के माता पिता से आग्रह है बेटियों के लिए जीवनसाथी की खोज करें जो वाकई में आपकी बेटी का जीवन भर साथ निभा सके कोई ऐसा राजकुमार नहीं जो उसे बीच रास्ते में अकेला छोड़ दे।
कडवा जरूर है पर सत्य है। 🙏🙏🙏
Shikha Sharma