नारी का ईश्वर से सवाल
मै पुछती हुं ईश्वर,
क्या दोष है मेरा ये,
नारी का जन्म पाके,
अपराध क्या किया है।
लिया जन्म जिस दिन,
बनकर के मैने बिटिया,
मातम सा छा गया था,
घर में भला क्यों उस दिन।
मै भी तो संतान हुं,
देन हुं तेरी ही,
फिर भेदभाव कैसा,
संसार में तेरे ये।
त्याग और समर्पण की,
मूरत मुझे बनाया,
फिर भी ना जाने मुझको,
क्यों संसार ने ठुकराया।
बनकर के फुलबारी,
इस तरह खिल रही थी,
मै बनके कोई खुशबु,
मेहका रही थी अंगना।
मै बड़ रहीं हुं आगे,
सम्मान वो मिला ना,
हकदार हुं मैं जिसकी,
स्थान वो मिला ना।
हर क्षेत्र में मैने तो,
नाम अपना किया है,
पर आज भी मै ईश्वर,
क्यों बोझ ही कहाऊं।
मै लड़ रही हुं अब तक,
अस्तित्व की लड़ाई,
अस्तित्व मेरा क्या है,
जरा मुझको ये बता दे।
कर कर के खुद को साबित,
अब मै तो थक रही हुं,
हर पथ पे मेरे ईश्वर,
मै दे रही परीक्षा।
तुने भला क्यों मुझको,
दो दो घरों में बांटा,
जब एक भी नहीं था,
कहने को मेरा अपना।
Shikha Sharma
घर में रहते हुए ग़ैरों की तरह होती हैं
ReplyDeleteबेटियाँ धान के पौधों की तरह होती हैं
शिखा जी बुहुत अच्छी लाइन 🙏🙏🤟
बहुत सुंदर मन को भा गई, तेरी इन पंक्तियों मे दुनिया समा गई।
ReplyDeleteधन्यवाद 🙏
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