Friday, September 24, 2021

शायरी

"जिंदगी जीने की कला कुछ इस तरह सीखी है
हमने खुद से मोहब्बत करने की अदा सीखी है"

Shikha Sharma

नदी का प्रेम

समेटे है कई सपने,
नदी अपनी ही धारा,
नदी की आरज़ू है क्या,
भला सागर ये क्या जाने।

वफा का रंग है शामिल,
नदी की हर एक धारा में,
मिसालें वेवाफाई की,
के देता हैं समंदर ये।

नदी का है समंदर एक,
समंदर की नदियां हजारों हैं,
करे सृंगार जब नदियां,
दर्पण सागर का चाहे वो।

नदी निकले पहाड़ों से,
जब बन संवर कर यूं,
लगाकर चांद की बिंदिया,
ओढ़कर लहरों का आंचल यूं।

चले इठलाती बलखाती,
प्रीत के सपने सजाती वो,
के ये मुश्किल भरी राहें,
खुशी से पार करती है।

नदी की बस यही चाहत,
मिले सागर में जाके वो,
नहीं दुजा कोई सपना,
सिवा सागर को पाने के,

नदी का प्रेम है सागर,
नदी की आरज़ू सागर,
जो समझे ये समंदर तो,
नदी का हमसफ़र सागर।
 
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Shikha Sharma

Monday, September 13, 2021

जीवन का दस्तूर

जीवन का दस्तूर

जीवन का यही बस एक,
दस्तूर होता है,
अकेले ही तो आए थे,
अकेले ही तो जाना है।

दिखावे के ये मेले हैं,
भीड़ में हम अकेले हैं,
के दौलत की ये दुनिया है,
यहां क्या मोल है अपना।

ना दौलत है ना शौहरत है,
फकीरों में शुमारी है,
फकीरों की भला भी क्या,
कहीं कोई कद्र होती है।

लगे कई घाव तो ऐसे,
 मगर हमने सभी झेले,
के अब लगता है ये लेकिन,
के दिल मेरा तो छलनी है।

समेटे हुं समंदर मै,
मेरी आंखों में अश्कों का,
लगे ना चोट अपनों को,
लिए मुस्कान झूठी हुं।

मुझे लगता है जो प्यारा,
वो रब तु छीन लेता है,
सितम हमपे भला रब क्यों,
हमेशा ऐसे करता है।

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Shikha Sharma

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सरहद के वीर  अगर सरहद पे तुम हो तो,  यहां महफ़ूज़ हम सब हैं।  ना दहशत है कोई दिल में,  ना कोई खौफ़ है मन में।  हमारा ताज है तुमसे, वतन की शा...