Friday, September 24, 2021

नदी का प्रेम

समेटे है कई सपने,
नदी अपनी ही धारा,
नदी की आरज़ू है क्या,
भला सागर ये क्या जाने।

वफा का रंग है शामिल,
नदी की हर एक धारा में,
मिसालें वेवाफाई की,
के देता हैं समंदर ये।

नदी का है समंदर एक,
समंदर की नदियां हजारों हैं,
करे सृंगार जब नदियां,
दर्पण सागर का चाहे वो।

नदी निकले पहाड़ों से,
जब बन संवर कर यूं,
लगाकर चांद की बिंदिया,
ओढ़कर लहरों का आंचल यूं।

चले इठलाती बलखाती,
प्रीत के सपने सजाती वो,
के ये मुश्किल भरी राहें,
खुशी से पार करती है।

नदी की बस यही चाहत,
मिले सागर में जाके वो,
नहीं दुजा कोई सपना,
सिवा सागर को पाने के,

नदी का प्रेम है सागर,
नदी की आरज़ू सागर,
जो समझे ये समंदर तो,
नदी का हमसफ़र सागर।
 
इस कविता को सुनने के लिए
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Shikha Sharma

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