उलझन
अजब उलझन चले मन में,
इसे सुलझाऊं मैं कैसे,
ना दिखता रास्ता कोई,
मंजिल पाऊं मैं कैसे।
चले मन में मेरे ये क्या,
ये मैं ही जानु ना,
मेरे उलझे सबालों के,
जवाब पाऊं मैं कैसे।
अजब सा खेल चल रहा,
मेरे जीवन की नैया में,
खिलौना खुद ही बन गए,
पार मै जाऊं तो कैसे।
चल रही जंग ये कैसी,
लड़ रही हुं मैं खुद से क्यों,
के ऐसी जंग में बोलो,
जीत जाऊं तो मैं कैसे।
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Shikha Sharma
गजब 🤟👏👏
ReplyDeleteThanks
DeleteSuperv
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