Monday, September 13, 2021

जीवन का दस्तूर

जीवन का दस्तूर

जीवन का यही बस एक,
दस्तूर होता है,
अकेले ही तो आए थे,
अकेले ही तो जाना है।

दिखावे के ये मेले हैं,
भीड़ में हम अकेले हैं,
के दौलत की ये दुनिया है,
यहां क्या मोल है अपना।

ना दौलत है ना शौहरत है,
फकीरों में शुमारी है,
फकीरों की भला भी क्या,
कहीं कोई कद्र होती है।

लगे कई घाव तो ऐसे,
 मगर हमने सभी झेले,
के अब लगता है ये लेकिन,
के दिल मेरा तो छलनी है।

समेटे हुं समंदर मै,
मेरी आंखों में अश्कों का,
लगे ना चोट अपनों को,
लिए मुस्कान झूठी हुं।

मुझे लगता है जो प्यारा,
वो रब तु छीन लेता है,
सितम हमपे भला रब क्यों,
हमेशा ऐसे करता है।

इस कविता को सुनने के लिए दिए
गए ऑडियो लिंक पर क्लिक करें 👇

Shikha Sharma

2 comments:

  1. इस जीवन के दस्तूर मैं हर इंसान तन्हा है

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