गणपति जी की शरारतों के कई किस्से प्रचलित हैं
आज मैं उन्हीं की शरारत का एक किस्सा आपको बताती
हुं।
हम सभी जानते हैं गणपति जी बचपन में बहुत शरारती थे।
एक बार नटखट गणपति कैलाश पर्वत पर खेल रहे थे,
और पशु पंछियों को तंग कर रहे थे।
यह सब माँ पार्वतीजी ने चुपके से देख लिया और मन में गणपति जी को सीख देने का विचार किया और माँ पार्वतीजी एक बिल्ली का रूप धारण कर गणपति जी के पास चली गईं।
तभी गणपति जी की नज़र उस बिल्ली पर पड़ी और उन्होंने उस बिल्ली को भी तंग करना आरंभ कर दिया।
जिसके कारण उस बिल्ली को बहुत चोट आई।
थोड़े समय पश्चात गणपति जी को भूख लगी और वे माँ पार्वतीजी के पास गए।
तब उन्होंने देखा माँ पार्वतीजी को बहुत चोट लगी हुई थी,
उन्होंने माँ पार्वतीजी से चोट लगने का कारण पूछा।
तब माँ पार्वतीजी ने उन्हें बताया की जब वे अपने मनोरंजन के लिए पशु पक्षियों को तंग कर रहे थे और उन्होंने जिस बिल्ली को तंग किया वह कोई और नहीं बल्कि स्वयं माँ पार्वतीजी खुद थीं।
और उनके कारण जो चोट बिल्ली को लगी यह वही चोट है।
यह सब सुनकर गणपति जी को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने माँ पार्वतीजी को वचन दिया के आज के बाद अपने मनोरंजन के लिए किसी जीव जंतु या किसी भी बेजुबान प्राणी को तंग नहीं करेंगे
शिक्षा
तो बच्चों इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है की हमें
अपने मनोरंजन या अपने खेल के लिए किसी भी जीव जंतु या किसी भी बेजुबान प्राणी को परेशान नहीं करना चाहिए क्योंकि जिस तरह हमें चोट लगती है उसी तरह उन्हें भी चोट लगती है जैसे हम में प्राण हैं उसी प्रकार उनमे भी प्राण हैं।
Shikha Sharma
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